आज की पत्रकारिता को कहाँ किसकी नज़र लग गई है। आज स्थिति यह है की मेढ़ ही खेत चरने में लगी है। किसी भी फिल्ड में देखिये पत्रकारों की पिटाई से लेकर उनकी भर्त्सना तक चौथे स्तम्भ के दंभ को कम करता है। आज हम अपने को पत्रकार कहने में डरते है। ये तो दूसरों की बात है। इतने संघर्ष के बाद भी कभी कभी कंपनी से या तो निकाल दिया जाता है। या पेमेंट ही नहीं दिया जाता है। दूसरों से तो ठगने की बात समझ में आती है। परन्तु जब अपने ही ठगने लगें तो उस देश का क्या होगा। विचार कर बताएं मेरे ई-मेल पते पर बताएं धन्यवाद